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शब्दों से अब कुछ न कहेंगे

                
                                                         
                            मौन साधना है जीवन की मौन कामना है हर मन की
                                                                 
                            
पल भर में विश्वास दिला कर खो जाने की आदत इसकी,
इसमें खोकर सब मिल जाता जीवन का हर दुख मिट जाता
मन ही मन अब सब सह लेंगे ,शब्दों से अब कुछ न कहेंगे।

शब्द बहुत बलशाली होते ,कभी-कभी बलिहारी होते।
कभी नींद से हमें जगाते ,कभी जगा कर स्वयं ही सोते।
सोकर व्यर्थ बिताया जीवन ,अब सपने में हम न रहेंगे
सपने में लड़ लेंगे हम तुम ,पर शब्दों से कुछ न कहेंगे।।

पीड़ा तो अनुभव का स्वर है ,अनुभव से कम होती पीड़ा।
स्वर आरोही होते जब जब ,अवरोही तब होती पीड़ा।
व्याकुल हो जब भी मन अतिशय, सरगम सारी व्यथा कहेंगे
शब्दों में गढ़ लेंगे पीड़ा पर शब्दों से कुछ ना कहेंगे।।

निद्रा में सुख नहीं यहां पर, वो उसको सुख मान रहे थे।
कष्टों से हर ना पीड़ा हम ,अपना पौरुष मान रहे थे।
सुख की सइया हो उनकी बस, हम बहकर भी पार तरेंगे।
लड़ लेंगे बहते दरिया से, पर शब्दों से कुछ ना कहेंगे।।

नदिया ,झरने ,चांद सितारे ,घाटी में बहते बादल भी।
पल पल , छण छण, आधी ,तम सूरज सागर भी।
आवेगो के प्रबल वेग से ,यह भी तो पल-पल भीगेगे।
तुम सुन लेना मौन हमारा, हम शब्दों से कुछ न कहेंगे।।

-जीवन गहतोड़ी
 
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2 वर्ष पहले

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