ग़ज़ल
भरोसा तोड़ने वाले भरोसा दे रहे हैं
हमेशा की तरह कुछ लोग धोखा दे रहे हैं
बहारों का किया वादा, ख़िज़ाँ लेकर के लौटे
हमें क्या चाहिए था वो हमें क्या दे रहे हैं
किसी के हाथ में पत्थर, कोई ख़ंज़र लिए है
वतन वाले वतन को यह भला क्या दे रहे हैं
ग़रीबों को मेरे आका बता क्या-क्या सज़ा दें
अभी तक भूख, डंडा, डर, दिलासा दे रहे हैं
न कोई था, न कोई है, न होगा कोई तुझ-सा
कई बैंगन ये हिटलर को भरोसा दे रहे हैं
हमारे घर पे नजरें टिक गयी हैं आज उनकी
हिफ़ाज़त के लिए जो घर में पहरा दे रहे हैं
बसाया था कभी जिनको मोहब्बत से नज़र में
चुराकर आँख का काजल वो चकमा दे रहे हैं
मुझे पत्थर, दुआ, गाली, किसी ने फूल भेजे
जहाँ वालों पे जो-जो था ख़ुदाया दे रहे हैं
वो वादे के कभी पक्के कहाँ थे जो अभी हों
कि झूठे लोग वादा फिर से झूठा दे रहे हैं
जड़ों को काटकर शाख़ों पे पानी डालकर वो
बग़ीचे को हरा रखने का जुमला दे रहे हैं
सुधर जाओ बुरे लोगो वगरना रोओगे फिर
सुधरने का तुम्हें हम एक मौक़ा दे रहे हैं
हिफ़ाज़त में वतन की जान दे दो, जान ले लो
तुम्हें ऐ "प्रेम" हम ये ख़ास ज़िम्मा दे रहे हैं
- पंडित प्रेम बरेलवी
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