प्रभात में समय
एक ठंडी तितली बन उड़ता है,
ओस से भीगे फूलों पर
रंगीन पंख फैलाता है,
सूरज की पहली किरणों में
धीरे-धीरे घुल जाता है।
दोपहर में समय
एक अजगर बन जाता है,
तपती हुई धरती पर
चुपचाप रेंगता जाता है,
हर क्षण को तेजी से पीछे छोड़कर,
फिर भी धीमी गति का आभास देता है।
संध्या में समय
एक बेचैन पक्षी बन जाता है,
डूबते हुए सूरज को निहारता हुआ
क्षितिज की ओर दौड़ता है,
दिन की अंतिम रोशनी के साथ
दूरस्थ आकाश में उड़ जाता है।
प्रभात में पंख;
दोपहर में रेंगते हुए कदम,
संध्या में उड़ान और दौड़,
तीनों में अंकित एक ही प्रश्न।
समय बदलता ही रहता है,
क्या काल कभी स्थिर होगा?!
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