मनुष्य का प्रथम और प्रधान धर्म
बस इतना ही है:
जीवन के सुख को पाना
और जीवन को सुंदर बनाना।
पर किसी के अहित की कामना किए बिना
उस सुख को अर्जित करना ही उचित है।
आत्म-सुख अनिवार्य है,
पर स्वार्थमय सुख
त्यागने योग्य है।
अपने मन की प्रसन्नता को सँजोना,
पर किसी के दुःख पर
अपने सुख का महल न खड़ा करना;
अपने जीवन में उजाला भरना,
पर किसी और का प्रकाश न बुझाना।
यही तो है,
शायद,
जीवन-दर्शन का सार,
और जीवन-मूल्यों का
सर्वस्व।
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