मुझे याद आता मेरा वो बचपन,
गाँव में गुज़रा नटखट लड़कपन।
बाग़ों की छाँव में पिठूल खेलना,
गरारी के साथ गलियों में घूमना।
खेतों से उखाड़ना चने व मटर,
भूनना सबकी नज़रों से छुपकर।
मेढ़ पकड़कर खेतों पर जाना,
अभिनव क्रीड़ा करते थे नाना।
छोटे से पोखर के प्यारे वो पनघट,
पर्व-त्योहारों में लगता था जमघट।
पेड़ों पर चढ़ने में रहते थे आगे,
डालों से पोखर में लगाते छलाँगें।
खेतों में घूमकर सागों को चुनना,
खलिहान में रखी फसलों में छुपना।
कमेंट्री सुना करते मेढ़ों पर बैठ,
ना था दिखावा, ना थी ऐंठ।
छत और मुंडेरों से यारी बढ़ाना,
ताऊ का इन बातों पर गुस्साना।
बारात की रातों में देखना नौटंकी,
बहुत याद आती, बातें कीं जो मन की।
चाकरी के चक्कर में शहर में आना,
प्रकृति छोड़ पैसे का बनना दीवाना।
विचारों की शून्यता, भावों की सस्ती,
प्यारा था बचपन और मेरी बस्ती॥
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