आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैने खूद को तपाया है

                
                                                         
                            मैंने ख़ुद को तपाया है,
                                                                 
                            
बड़ी मुश्किल से ये नाम मैंने पाया है।
कह लो लेखक, कवि, गीतकार,
आपके दुलार में ये धन कमाया है।

फँस गया था मैं दुनियादारी में,
रंग गया था रंगदारी में।
आज खुली जो आँख मेरी,
भटक गया था भरी जवानी में।

खुशियों से उछल रहा ये मन,
नाच रहा तन।
मैंने ख़ुद को तपाया है,
ख़ुद में ही समाया है।

बड़ा भाग्यशाली मैं,
जो आपके दर्शन पाया है।
देना आशीष मुझे,
न बहके ये मन।

प्रेम के पंख लगाकर मैं,
उड़ता फिरूँ गगन।
ये जन-जन को मैं करता हूँ नमन,
करता हूँ नमन।
-भुनेश्वर अनंत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर