मैंने ख़ुद को तपाया है,
बड़ी मुश्किल से ये नाम मैंने पाया है।
कह लो लेखक, कवि, गीतकार,
आपके दुलार में ये धन कमाया है।
फँस गया था मैं दुनियादारी में,
रंग गया था रंगदारी में।
आज खुली जो आँख मेरी,
भटक गया था भरी जवानी में।
खुशियों से उछल रहा ये मन,
नाच रहा तन।
मैंने ख़ुद को तपाया है,
ख़ुद में ही समाया है।
बड़ा भाग्यशाली मैं,
जो आपके दर्शन पाया है।
देना आशीष मुझे,
न बहके ये मन।
प्रेम के पंख लगाकर मैं,
उड़ता फिरूँ गगन।
ये जन-जन को मैं करता हूँ नमन,
करता हूँ नमन।
-भुनेश्वर अनंत
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