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ऐ! मुसाफिर

                
                                                         
                            गम के अंधियारा हे
                                                                 
                            
सूरज के रोशनी में तप के जाना हे
ऐ मुसाफिर पलट के न देख - 2
एक दिन आगे बढ़ जाना हे।

रिश्ते नाते तू छोड़ के चल
अकेला है,अकेला ही निकल जा
साथी कोई नहीं तेरा इस जग में
ऐ मुसाफिर हंसता जा
गम के ——————— जाना हे।

निगाहें ताकती रह जायेंगी तुझे
सफर लगता है सुहाना
नाम ले ले रब की
बदल जायेगी आशियाना
गम के ——————— जाना हे।

लोग नफरते भी करते हैं इंसान से
और मुहब्बत इन दिवारों से
गर जुनून हो दिल में
तो बदल जायेगा सारा पैमाना विचारों से
गम के ——————— जाना हे।

गर्दिश में सितारे चमकते हैं
खुदा कसम ये नजारे अपने हैं
चलते जा चलते जा
मंजिल पाना हे।
गम के ——————— जाना हे।
-भुनेश्वर अनंत
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4 घंटे पहले

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