मन्नत के धागे अजीब होते हैं
न तो वे लोहे जैसे मज़बूत,
न ही रेशम जैसे कोमल,
पर दिल के बोझ को
सबसे हल्का कर देने की शक्ति रखते हैं।
कोई टहनी पर बाँधता है,
कोई दरगाह की जाली पर,
कोई बस अपनी कलाई में
मानो कह रहा हो कि
उम्मीदों की कोई जगह तय नहीं होती,
वे जहाँ बँध जाएँ,
वहीं पनप जाती हैं।
धागा जब हवा में हिलता है,
तो लगता है इच्छाएँ भी
अपनी दिशा खोज रही हैं
कभी उजाले की ओर,
कभी अपने भीतर की शांति की ओर।
पर सोचता हूँ,
क्या सच में धागे मन्नतें पूरी करते हैं?
या फिर वे बस हमें यह याद दिलाने आते हैं
कि भरोसा
किसी चीज़ पर हो या किसी क्षण पर
इंसान को आगे बढ़ा ही देता है।
शायद धागा केवल प्रतीक है,
मन्नत तो वह है
जो हम चुपचाप अपने भीतर बाँध लेते हैं,
और समय के साथ कई उलझनें, मुश्किलें
धीरे-धीरे सुलझती हुई महसूस होती है।
- भारती यादव 'मेधा '
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