वर्ष उन्नीस सौ निन्यानब्बे की ,
कहानी यों सुनाता हूँ l
भारत माँ के वीरों की ,
विजय गाथा मैं गाता हूँ ll
नापाक सेना पाक की ,
कारगिल में घुस आयी थी l
हिन्द के वीर सपूतों को यह ,
फूटी आँख न भायी थी ll
तोलोलिंग की चोटी पर ,
लड़ी गयी बड़ी लड़ाई थी l
द्रास,बटालिक,टाइगर हिल की ,
मुश्किल विकट चढ़ाई थी ll
अदम्य सौर्य और साहस ,
रण बांकुरों ने पाया था l
भर हुंकार मेघ गर्जना ,
तिरंगा हाथ उठाया था ll
गूँज उठा घाटी का हर कण ,
दुश्मन भी थर्राया था l
बाँध कफ़न सिर पर जब ,
भारत का शेर गुर्राया था ll
काँप उठी धरती सारी ,
गगन मण्डल डोल उठा l
पिघलते चोटी के हिम प्रस्तर ,
भारत का जन-जन बोल उठा ll
गरज उठी तोपें बोफोर्स की ,
दुश्मन डर कर भागा था l
नया सवेरा लाने को ,
हर सपूत हिन्द का जागा था ll
तारीख छब्बीस जुलाई की ,
तिरंगा चोटी पर लहराया था l
हिन्द की सेना अमर रहे ,
हर जन के मन को भाया था ll
कायर सेना पाक की ,
कभी उसको लाज न आयी l
अनेकों बार मुंह की खाई ,
फिर भी छद्म से बाज न आयी ll
परवाह नहीं मिटने की ,
कौन यहाँ मौत से डरता है l
सौ-सौ बार जनम ले धरती पर ,
सौ-सौ बार इसी पर मरता है ll
भगत सिंह राणा ' हिमाद '
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