चाँद महरूम होगा अब उस मासूमियत से,
कि अब उस पर फिर से कोई ग्रहण न लगेगा।
बादलों से भी ओझल हुआ चौथ का चाँद तो,
रोवर से उसका मेघ-अवगुंठन छँटने लगेगा।
अब छिप न पाएगा तू अमावस को, ट्यूबलाइट लगेगी,
न पूनम को सँवरने पाएगा, प्राचीर पर विज्ञापन सजेंगे।
अब तू बड़ा महँगा होगा, तुझ पर वैट जीएसटी लगेगी,
रेस्टोरेंट, ढाबे लगेंगे, हनीमून की टिकट बिकेगी।
तेरी ज़मीन की नाप-जोख को लेखपाल पहुँचेंगे,
कानूनगो नक्शा लेकर तेरे गड्ढे नापेंगे।
जो कल तक था सबका मामा, अब भूखंड कहलाएगा,
धनवानों के नाम चाँद का कुछ हिस्सा हो जाएगा।
खबर दिनभर चलेगी टीवी चैनलों पर महासंग्राम होगा,
तुझसे ज्वार-भाटे उठेंगे, अद्भुत चुनावी परिणाम होगा।
कोई कहेगा—चाँद हमारा, कोई अपना हक़ जताएगा,
कोई चाँद दिलाने के वादे कर संसद पहुँच जाएगा।
तेरी मिट्टी बिक जाएगी, तारों की बोली लगेगी,
चाँदनी पर कर लगेगा, रोशनी भी महँगी लगेगी।
जिस चाँद को देखकर दुनिया प्रेम के गीत सुनाती थी,
उसी चाँद की धरती पर अब स्वार्थ की फ़सल उग आएगी।
जो कल तक सुहागिनें , करवांचौथ लेती थीं
अब वही डिमांड में, तेरी रजिस्ट्री मांगेंगी।
ऐ चाँद! तू दूर ही रहना, अपनी शीतलता के साथ,
धरती के इंसानों से बचना, उनके कानूनों के हाथ।
तू सबका था, सबका रहना, यही तेरी पहचान रहे,
तेरी चाँदनी मुक्त रहे, न किसी का अधिकार रहे।
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