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प्रकृति और ईश्वर

                
                                                         
                            पौधे और नदियों में ही, मेरी दुनिया दूजी है।
                                                                 
                            
खुले आसमान के नीचे ही, मुझे मिलता सुकून का मंज़र है,
सच कहूँ तो बस प्रकृति ही, मेरा सबसे बड़ा ईश्वर है।
सुनी-सुनाई बातों पर, मैं कभी नहीं भटका हूँ,
अंधविश्वास के जालों में, मैं कभी नहीं अटका हूँ।
तर्क की कसौटी पर जो खरा उतरे, बस वही बात मैं मानता हूँ,
एक विज्ञान को ही इस दुनिया में, मैं परम सत्य जानता हूँ।
किस्मत के भरोसे बैठकर, मैंने कभी भी आस न लगाई,
मेहनत की रोटी में ही, मुझे हमेशा दिखी है भलाई।
हाथ जोड़कर माँगने से बेहतर, मुझे अपना पसीना दूजा है,
सच्चे मन से किया गया कर्म ही, मेरी सबसे बड़ी पूजा है।
जात-पात और धरम के झगड़े, मैंने कभी न पाले हैं,
दिल में सबके लिए प्यार हो, बस ऐसे ही मेरे उजाले हैं।
मुश्किल में किसी के काम आना, यही मेरे जीवन का मर्म है,
मेरे लिए तो इस दुनिया में, बस इंसानियत ही धर्म है।
— बजरंग बीकानेरी
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एक घंटा पहले

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