इस नीले आसमान पर,
सुनहरी धूप का कैसा जादू!
मेरे सोए हुए मन में,
किसने गुनगुनाया यह मीठा गीत?
दुख की वह घनी काली रात,
सुबह की पहली किरण के साथ बीत गई।
खुल गई आँखें, धुल गए सारे आँसू,
और भीतर एक नई सी जान जाग उठी।
सजी-धजी कलाकार सी कुदरत,
जिसके ज़र्रे-ज़र्रे में धड़कता संगीत।
मेरे दिल के खामोश तारों को छेड़कर,
आज अंदर ही अंदर कौन मुस्कुराया?
लगातार बहने वाली,
वक्त की इस नदी का अजब ही खेल।
एक तरफ मन की कभी न बुझने वाली प्यास,
और दूसरी तरफ यह सुंदर विशाल आसमान।
— बजरंग बीकानेरी
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