हमको जीने की क्या क्या दे गई सीख।
शहर की इन अंधी दीवारों से पूछो,
किसने सुनी है यहाँ सन्नाटों की चीख।
ख्वाब बुनते रहे उम्र भर हम यहाँ,
उंगलियों में चुभ गई हकीकत की लीक।
हर चेहरे पे है इक नया मुखौटा,
अब कोई भी शक्ल लगती नहीं है ठीक।
आसमानों की हसरत किसे है अब,
बस ज़मीं पर कदम टिक जाएं तो है ठीक।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X