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मिरे उसूल में अब भी वही सदाक़त है।

                
                                                         
                            मिरे सुकून का हासिल तिरी मोहब्बत है।
                                                                 
                            
मिरे वजूद की दुनिया भी तेरी चाहत है।

न तख़्त चाहिए मुझको, न ही कोई दौलत,
मिरे लिए तो तिरी याद ही हुकूमत है।

ज़माना लाख बदल ले जो अपने रंग मगर,
मिरे उसूल में अब भी वही सदाक़त है।

न कोई दस्त-ए-तलब है, न कोई ख़्वाहिश-ए-ज़र,
मिरी फ़क़ीरी ही मेरे लिए तो नेमत है।

चराग़ बुझ गए लेकिन धुआँ गवाही है,
अभी तो दिल में किसी आग की हिफ़ाज़त है।

न आसमान की चाहत, न कहकशाँ की तलब,
ज़मीं पे तेरा बिछड़ना ही एक क़यामत है।

न सर झुका है किसी के भी सामने, ‘अज़हर’,
मिरी फ़क़ीरी ही मेरी असल हुकूमत है।

- अज़हर साबरी
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एक घंटा पहले

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