बचपन बीता आम, इमली और शहतूत के साए में,
अब जवानी ढल रही है सिगरेट और शराब में।
पंद्रह साल की उम्र में ही ज़हर चखने लगे हैं बच्चे,
जाने कैसा आतंक छाया है इस दौर-ए-खराब में।
हार रहे हैं घर के बुजुर्ग, समाज के रक्षक सारे,
और मरीज ढूँढ रहा है इलाज, नशे के मज़ाब में।
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