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ये उदासी क्या गजब ढ़ा रही है

                
                                                         
                            चितायें लाख देखों वहाँ जली जा रही है
                                                                 
                            

ये उदासी क्या गजब ढ़ा रही है

जिन्दगी उसमें मेरी रंगी जा रही है ।

मोहब्बत के जुनून में मगरूर लोगों

देखो मोहब्बत ही अब मुझे खाये जा रही है।

खून में डूबे हुये है मेरे जिगर के टुकड़े,

दाग रो-रोकर आँखें आँसूओं से बहा रही है।

अश्क पीता हूँ मैं खुद अपनी गैरत में रहकर,

अब गैरत ही वही, मुझे खतावार ठहरा रही है।

जिन्दगी अब तेरी खैर नहीं खुदा की कसम,

खैरियत भी आज सरेआम मुझे ठगे जा रही है।

सुर्ख लबों पर ये बात आकर ठहर गयी,

पीव वफा ही जिगर में बेवफाई निभा रही है।

चाहा जिगर में हम गम को दफन कर देंगे,

चितायें लाख देखों वहाँ जली जा रही है।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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