ये गुल हमने खिलाये हैं
परिवर्तन के झुनझुनें
कुछ हमने बजाये हैं
बेसहारा मजबूरों के चेहरे
उसे सुनकर मुस्कुराये हैं
तुमने दबा दिये सारे स्वर
कुछ ऐसे ही भूकम्प जगाये हैं।
जनक्राति के गीत
कुछ हमने गाये हैं
पराधीन भाबुक मन ने
अपने दिल में सजाये हैं
किन्तु पुराने कानों के परदों ने
कुछ जलभुनकर ये ठुकुराये हैं।।
अरमानों क ज्वाला मुखी
कुछ हमने जगाये हैं
सूखे ऑसुओं की जलती ऑखों ने
अभावों से भी शीतल बताये हैं
सब अपनी ने ही दमन किये
कुछ ऐसे धन के अंबार लगाये हैं।।
महाप्रलय की अंधड ऑधी
कुछ हमने चलायी है
उखड जाये सब अंधविश्वास डूंड,
अपने जन्म पर युवा चेतना हर्षायी है।
सब फूटते इन अंकुरों को दबा दिया
कुछ ऐसे डुंडों ने ही रोक लगायी है।।
घायल दिल के युवकों को
कुछ हमने सहलाया है
अतीत की उफनती लहरों ने
भॅवर में उनका भविष्य फॅसाया है
अंधेयुग के आकाओं ने
कुछ ऐसे सदियों से ही डुबाया है।
पथराई हुई ऑखों को
कुछ सपने हमने दिखाये हैं
अन्यायपूर्ण हरकती दलीलों से
वे अब भी घबराये हैं
बुदबुदाते हताश- उदास वे
कुछ ऐसे ही हम पर चीखे चिल्लाये हैं।
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