आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

संकोच...

                
                                                         
                            संकोच
                                                                 
                            
शर्मे हयात गर तू यूं करती रही

जिन्दगी की पतवार फिर, न संभले कभी

बीत जायेगी जिन्दगी मेरी,फिर उस जहाँ में

जहाँ हुस्ने-मलिकायें नित संवरती रही

जिगरे नांदा को न तोड़ ओ मेरे दिले नूर

वर्ना मिल जायेगी दिल बहलाने,कई जन्नते हूर

पीव दिले रोशन करे गर मेरा, जन्नत की हूर

हुजूर जायेगा कहाँ फिर तेरा ये शबाबे नूर

मुझे इल्जाम न लगा देना बेवफाई का, हो अपने में गरूर

रबे ढ़ह जायेगी शराफत की दीवारें,गर रहा उसे मंजूर

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
चढ़ायें।
 
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर