संकोच
शर्मे हयात गर तू यूं करती रही
जिन्दगी की पतवार फिर, न संभले कभी
बीत जायेगी जिन्दगी मेरी,फिर उस जहाँ में
जहाँ हुस्ने-मलिकायें नित संवरती रही
जिगरे नांदा को न तोड़ ओ मेरे दिले नूर
वर्ना मिल जायेगी दिल बहलाने,कई जन्नते हूर
पीव दिले रोशन करे गर मेरा, जन्नत की हूर
हुजूर जायेगा कहाँ फिर तेरा ये शबाबे नूर
मुझे इल्जाम न लगा देना बेवफाई का, हो अपने में गरूर
रबे ढ़ह जायेगी शराफत की दीवारें,गर रहा उसे मंजूर
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