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प्यास.....

                
                                                         
                            प्यास
                                                                 
                            
ओ कुम्हरे तू बना ही देना,
मेरी देह को एक गगरिया।
फूटी हो न रिसे कहीं से,
थ्जसे सावत रखु में सारी उमरिया।
जीवन की अंतिम साँसों तक अमृत भर लूँ
गागरिया को कर दूँ
जैसे मैं पूनम की चांदनिया।
रे जितनी खाली हो,
उतना अंधेरा अंतरमन में
ज्योति जलाकर,
पीव फेलाये ज्योतनिया।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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