प्राणों में तेरी प्यास है
ये जमी पर झुका -झुका सा लगे आसमां
पर पाओगे न उसे कहीं पर भी झुका है।
बुलन्दी आसमाँ की शिखर चूमती है,
इन्सानों की भी लेकर ये बुलन्दी घूमती है।
इस मालिक की दुनिया का कैसे करूं मैं बयाँ
मैं ऐसे हूँ जैसे दुनिया में होकर भी हूँ ना।
परिव्राजक हूँ मैं सदियों से इस जहाँ का
मिला न अब तक मुझे तेरी दुनिया का कोई पता।
बिखरी है सारे जहाँ में एक तेरी ही अस्मिता,
लिखना पाया अभी तक फिर भी कोई सजीता।
शानोशौकत की तेरी एक छटा है निराली,
पर कहने का सबका है अलग अपना सलीका।
पीव प्राणों में मेरे लगी गहरी प्यास है,
बुझ न पाये साँसें है तब तक
हरदम गाऊं मैं तब तक तेरा ही तराना।
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