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निजत्व की ओर

                
                                                         
                            मेरा नगर
                                                                 
                            
शाश्वत काल से
अत्यन्त रमणीक और सुन्दर रहा है
और उसका महाशून्याकार आकाश
निर्मल असीम नीलिमा लिये रहा है।
न जाने कहॉ से
मॅडराते घने काले बादलों ने
मेरे नगर के सौन्दर्य को निगल लिया है।
कई अज्ञात नगरों में
होता हुआ
मैं इस ज्ञान विवेकयुक्त
अद्भुत नगर में आया हूँ।
मेरे नगर में
आरंभ में प्रवेश करते समय
मैं सम्राट बनकर आया था।
जिसमें मिट्टी जल वायु अग्नि और आकाश का
सुन्दर मंदिर
विराट अस्तित्व ने
प्रतिक्रमण करने हेतु दिया था।
जिसमें मेरी विरासत
पीवों के पीव से
रहस्यमय अर्न्तयात्रा करके
अंतरगृह में स्वाभाविक मिलने क ी थी।
मगर अब मैं अपने ही नगर में
एक भिखारी बनकर रह गया हूँ।
जो अपने स्वभाव से हट कर
काम क्रोध लोभ और मोह माया के
धने काले बादलों के बीच घिर गया हूँ।
जन्म से लेकर जगत से परिचित न होने तक
मेरा ह्दयाकाश
अखण्ड असीम विराट गहराई के लिये
बेबूझ परालौकिक रंगहीन
नीलिमा के तात्विक बादलहीन था।
इसमें वास करते सम्राट को
दूर तक इन बादलों का कोई पता न था।
वह नहीं जानता
इन बादलों को
और तूफानों को
क्योंकि इनकी प्रकृति से वह अनभिज्ञ रहा।
पर सम्राट की चेतना को
माया बाजार में भिखारी होने का
आभास कराया गया
जहॉ उसने पाया कि उसके नगर की
सुन्दरता खो गई मानों चन्द्रमा में लगे
धब्बे की तरह हो गई।
उसके पूर्ववत सौन्दर्य को लाना होगा
बादलों को हटाने के लिये
तूफानों को बुलाना होगा
जाने इन पर कहर बन कर छा जाये
या तो इन बादलों को बरसा कर
या इन्हें उडाकर ले जाये
तब कहीं मेरे नगर का
वास्तविक सौन्दर्य स्वरूप लौटकर आयेगा।
जहॉ माया बाजार का भ्रम टूटेगा
भिखारी बन बैठा सम्राट
परमात्मा के आनन्द को लूटेगा।
****** दो ********
करोडों जीवाणुओं से युक्त
मेरा शरीर एक रहस्यनगर है
जिसमें विराट ऊर्जा छिपी हुई है।
मेरे इस रहस्य नगर पर
मेरी असीम वासनाएं
घने काले बादलों की तरह छा गई है।
मेरे शरीर का ह्दयाकाश
जन्म के समय शाश्वत निर्मल और धबल रहा है
और मेरी वासनायें उम्र के साथ-साथ
अनन्त और विशाल होती गई है।
जो सारे ह्दय को
मस्तिष्क के साथ निगल रही है
इन बासनाओं का जहर
सारे नगर शरीर में फैल रहा है
और मेरा मन न जाने क्यों ?
मृत्यु के पास जाने हेतु
इस वासनाओं के मार्ग पर
पतन की ओर चल रहा है।
मेरी वासनायें मेरी कामनाओं का सम्प्रेषण है
जो मुझे स्वजनों से विरासत में मिली है।
इनमें सभी का स्वार्थ निहित है
पर मेरा ह्दयाकाश प्रेम रहित है।
मैं कामनाओं में
प्रेम को तलाश रहा हूँ
और वासनाओं की अति पर जी रहा हूँ।
सुना है एक अति से
दूसरी अति पर जो जाता है
वह शुन्य का या निजत्व का
पूर्व शाश्वत स्वभाव बोध पाता है।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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