आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मौत पर दुःख की अभिव्यक्ति

                
                                                         
                            मौत पर दुःख की अभिव्यक्ति
                                                                 
                            
बधाई हो, तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है,

यह सुनकर हरेक पिता के पोर-पोर में

एक अन्चाही खुशी की उमंग दौड़ पड़ती है

और वह जीवन में पहली बार

पति से पिता बन जाता है।

तब उसके हृदय में

फूट पड़ता है गीतों का झरना

और आँखों में तैरती है

वात्सल्य स्नेह की सरिता

जो शिशु को अधीरता के साथ देखने

और प्रेमांकन करने को आकुल होता है।

उसके कान लगे होते है

शिशु की मधुर किलकारियाँ सुनने को

पिता का अनुराग उमड़ पड़ता है शिशु पर

इस तरह दुनिया में चल पड़ता है

एक अनिर्वचनीय प्रेम गान

गाना,गुनगुनाना,रोना और नाचना।

न जाने कितने आयाम लिये

साँझ-सकारे शुरू हो जाती है

जीवन की बलखाती ये प्रेमभरी अंगड़ाईयाँ।

पति खो जाता है पत्नी में,

पत्नी खो जाती है पति के प्रेम में

कई भीनी-सुहानी मधुर रातों-बरसातों

और बदलते मौसमों के बाद

जब सुनने को मिलती है यह खबर

बधाई हो, तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है।

पल-पल उम्र के साथ बड़े होते शिशु पर

फिर बेशुमार सुखों की फुहारे

स्नेहहमयी वात्सल्य चान्दनी

और लोरियों के साथ सुलाती है माँ

अपने गीले आँचल में समेट कर

एक आशा संजोये सूखे में सुलाती है।

बच्चे की किलकारियाँ

फूलों की मादकता लिये

सारे परिवार की अंजलि में समेट ली जाती है।

कई दिन-रात,दिन-महीने और बरस के बाद

अपार तकलीफें-उपचार,निदान के पश्चात

मधुर भीनी सी खुशबू

शिशु से तरूण के रूप में

माता-पिता और परिवार को मिलती है।

न जाने कितने दौर

बहिन-भाई, बेटा बेटी

माँ-बाप, गुरू-मित्र के रिश्ते

और आसपास के पड़ोसियों का संसार

चारों और धाराप्रवाह मौजूद होता है

और जीवन कभी निरीह,असहाय

बाधाओं का जंजाल लिये

प्रार्थनाओं या आवश्यकता सा

विकृत,कामुक और कुण्ठित सा

यहाँ-वहाँ बिखरा होता है।

अकस्मात अपने युवा पुत्र की

दुर्घटना से दर्दनाक मृत्यु की खबर

जब घर पहुंचती है

तो कितना आत्मघाती होता है वह पल

जिसे सुनकर पिता खुद बन जाता है एक जिंदा ताबूत

परिवार में पसर जाता है,मौत सा सन्नाटा।

जब पिता को यह खबर मिले,

कि उसका बेटा नहीं रहा

आहिस्ता-आहिस्ता बेटे के लिये

पल पल मरता उसका पिता

और पूरा परिवार मानो मर ही जाता है

स्याह काली रात में बेटे का शव

घर पहुंचते ही कोहराम मच जाता है

आँखें भूल जाती है रोना?

दिल चीत्कार उठता है

भावनायें तिक्त हो जाती है

और दुखों से लिप्त उस परिवार के प्रति

मैं एक पड़ोसी की शकल में

रात की खामोशी तोड़ती

परिजनों की दुखभरी चीत्कारों से टूट जाता हूँ।

मेरा दिल और जेहन,

मुझे झकझोर कर रख देता है

खामोशी मृत्युपाश में बॅंधी

मेरे मन की दीवालों को हिलाती है

और मैं मौत की अभिव्यक्ति के लिये

तलाशता हूँ कोई शब्द या उपमा

जो मैं अपने पड़ोसी की मृत्यु पर समर्पित कर सकूं।

गमगीन रूदन कोलाहल के बीच

दिल रोने को करता है

किन्तु ये कमबख्त आँखें

आँसू टपकाने से बचती है

जिसमें मेरे पड़ोसी भले मुझे पत्थरदिल समझे

ऐसे में मेरा अंतरमन खो जाता है

गमों में अपने आँसू तलाश करने

तब समझता हूँ रो देना कितना दुविधा भरा है

पर ''पीव'' रो न सकना मन की बेबसी है।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
चढ़ायें।
 
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर