एक दीप मेरा भी जलायें
अबकी दीवाली सबकी
हो जाए परिपूर्ण
दूर हो दुःख दर्द,
और जिन्दगी हो पूर्ण
अनुपम जीवन स्नेह भरा,
आप सबको मिल जाए
हर उम्मीद और मंजिले को
मिल जाए सही दिशाएं
हर खुशियां नाचे आंगन में
*पीव* ऐसी दीवाली आये
अपने आंगन में अपनेपन का
एक दीप मेरा भी जलाये
अमावस की रात लगे पूर्णिमा
हिल मिल कर सब दीप जलाये
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें चढ़ायें।
कमेंट
कमेंट X