भूख
तन को सताती जब भूख हैं,
इन्सानियत से गिराती तब भूख हैं।
लगवाये भूख तन की यहाँ बोलियाँ,
जला दें आदर्शों की भूख यहाँ होलियाँ।
अतृप्त है विक्षिप्त है भूख से इंसान
घोंटकर गला ले भूख किसी की भी जान।
नाच जीवन भर भूख ही कराती है,
भेद सफेद काले का नहीं भूख कभी कराती है।
जहाँ गर भूख है -
जीवन नहीं उसूल नहीं
और न आदर्श पास है,
आनन्द नहीं उल्लास नहीं
और न परिहास है।
गुल और गुलिस्तां क्या
जाने ये जीव भी
भूख होती है क्या जाने ये पीव सभी।
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