पवन से बोलता हूँ
गगन से बोलता हूँ,
अगन से बोलता हूँ
मैं लगन से बोलता हूँ।
धरा से बोलता हूँ
चरा से बोलता हूँ,
परा से बोलता हूँ
मैं खरा सा बोलता हूँ।
बहारों से बोलता हूँ,
सितारों से बोलता हूँ
चान्द तारों से बौलता हूँ,
मैं इशारों से बोलता हूँ।
चन्द्र से बोलता हूँ
वृन्द से बोलता हूँ
कन्द से बोलता हूँ
हाँ में दृन्द से बोलता हूँ।
खग से बोलता हूँ
मृग से बोलता हूँ
दृग से बोलता हूँ
हाँ में रग-रग से बोलता हूँ।
जान से बोलता हूँ
इन्सान से बोलता हूँ
सारे जहाँ से बोलता हूँ
मैं जाने कहाँ से बोलता हूँ।
जो दिन से बोलता है
जो रात से बोलता है
जो अनवरत से बोलता है
मैं उसको बोलता हूँ।
महाशून्य से बोलता हूँ
महाकार से बोलता हूँ
जो तत्व है विराट का
पीव मैं उस बुद्घत्व को बोलता हूँ।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X