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अंतरंगानुभूति

                
                                                         
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प्रणय बंधन का अलौकिक आनन्द

प्रिय स्मृत हर पल आता है

है गणना में बीते हुये पल चन्द

मूर्छा बिरह में कर जाता है

हटने पर मूर्छा है कोमलांगी

दिल हर बार ये पुकार लगाता है

अपनी बाँहों को फैलाये प्रिय

आलिंगन हेतु कटिबद्ध रहो

अधरपान हेतु अधरों को

मम अधरों से आबद्ध करो

तेरी झुकी नजरों से हम ये जान गये

लज्जा है तेरा श्रृंगार बना

संगनी मेरी से व्यक्त्वि तेरा

राग-रागनी सा खिल उठा।

अर्धांगिनी से तब रग रग में

’’पीव’’ जैसे हो मधुमास सना।

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7 वर्ष पहले

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