अधूरी मंजिल
अजीज वूने क्या पिलाई मदिरा मुझे
ख्याले गम दुनिया मेरी मिट गई हो जैसे।
कयामत थी या वह हंसी रात मेरी
मिल गई हो मानो जैसे मंजिल मुझे।
अहा शबाब तेरा कयामत का रहा
उडा दी नींद मेरी उल्फत की तरह।
मैंने समझा न मिल पायेगी तू
बंदिश है तुझ पर कुछ रिश्तों की तरह।
ये रिश्ते हमारे अपने खूं के नहीं
फिर दिखते है जैसे ही नजदीकियाँ।
मंजिल मेरी तू राह मेरी
रिश्तों से हूँ पर मैं तुझसे जुदा।
यकीं करो गर जान भी दूं
होगा न संगम कभी हमारा।
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