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तुम बिन प्यासी मेरी अँखियाँ।

                
                                                         
                            शीत में ठिठुर-ठिठुर कर
                                                                 
                            
सूखे मेरे गात मनोहर
सिंह द्वार पर खड़े-खड़े हम
देख रहे हैं राह, प्रियवर!
आकर अब तो गले लगाओ
बाँह पसारे दुख गई छतियाँ, तुम—
याद आती है ऋतु ग्रीष्म की
जब हम-तुम आन मिले थे
द्वन्द्व न था कोई दोनों में
सरोवर में ज्यों कमल खिले थे
होंठों के मधु मकरंद, हम दोनों ने खूब पिये थे
जल रहे जब पाँव हमारे
तूने आकर अंक लगाया
उठा कोरव में, प्रिय, तूने
बड़ी जतन से हमें बचाया।
आ जाओ एक बार पुनः तुम
विपदा बड़ी आन पड़ी है
टूट गई है नाव हमारी
माँझी कब का डूब चुका है।
थका हाथ-पाँव, पतवार भी छूटी
अब तो केवल तेरा सहारा
याद आई है तेरी बतियाँ
तुम बिन प्यासी मेरी अँखियाँ।
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49 मिनट पहले

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