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'' व्यथा ''

                
                                                         
                            मैं आज एक ख्वाब देखना चाहता हूँ,
                                                                 
                            
किसानों के हाथों में अनाज देखना चाहता हूँ,
बच्चों के हाथों मे किताब देखना चाहता हूँ,
नौजवानों के हाथों में काम देखना चाहता हूँ,

मैं मंदिर देखना चाहता हूँ,
मैं मस्जिद भी देखना चाहता हूँ,
मैं आज फिर से किसी पंडित में,
एक अशफाक देखना चाहता हूँ,
सच कहु तो..
मैं अपने सपनों का हिन्दोस्तां देखना चाहता हूँ!

आशीष 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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