शब्दों की भूलभुलैया
चेहरों से निकले
शब्दों की भूल भुलैया में
कभी भूल मत जाना
हर एक शब्द का
एक ही अर्थ नहीं होता
खूबसूरत फोटो होठों से
निकले हुए शब्द भी
खूबसूरत होठों की तरह
लालिमा लिए हों जरूरी नहीं
रंगहीन चेहरे के शब्द
हमेशा रंगहीन ही नहीं होते
कई बार आदमी
रंगहीन चेहरे के भरम में
खूबसूरत सतरंगी शब्दों से
वंचित रह जाता है
टेढ़े मेढ़े वक्र चेहरों के शब्द
हमेशा वक्र नहीं होते
उनकी सपाटता सहजता सरलता
महसूसने के लिए
पारखी होना लाजमी है
वरना सहजता सरलता सपाटता का
वक्र चेहरों के भीतर ही
दम घुट जाता है
शब्दों की भूलभुलैया में
एक बार उलझ गए तो
उम्र भर नेति नेति उच्चारते
रहना पड़ सकता है
आधी अधूरी मंजिलों की सीढ़ियों पर
बढ़ते हुए
लक्ष्य भेदन की चाहत में
मरते हुए सपनों को गोद में रखकर
रोना पड़ सकता है
अशोक दर्द
समय के दुर्दम्य चक्रव्यूह में फंसकर
सब कुछ शब्दों की भूलभुलैया मैं छोड़कर
खाली हाथ मलते हुए
निरर्थकता को गोद में भरकर
हमेशा के लिए यहां से
विदा होना पड़ सकता है ...।।
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