नाराज़गी सी दिल में है
खुद से है या किसी और से,
ये बात समझ आती नहीं
बस सोचती हूं गौर से।
कुछ टुटा है अंदर कहीं
क्या टुट रहा है पता नहीं ,
बस दर्द का एहसास है
क्या छुट रहा पता नहीं।
कहीं ख्वाहिशें घायल पड़ी
कहीं हसरतें उदास है,
नज़रें गयी जहां तलक
सबकुछ तो आस पास है।
क्युं जिंदगी की राह में हम
चलते चलते रूक गये ,
जीवन के गहरे भाव को
समझने में हम चुक गए।
ये राहें है नाउम्मीदी की
इन राहों पर सिर्फ त्याग है,
कितना भी मनभावन हो सब
अंदर छुपी इक आग है।।
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