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कविता : इरफ़ान

                
                                                         
                            जयपुर की मिट्टी से निकला
                                                                 
                            
इक ‘साहबज़ादा’ !
क्रिकेटर बनने का ख़्वाब लिए
बड़ा हुआ।
मगर, यह उर्दू मास्टर,
फ़िल्मी खेल, खेल-खेलकर,
कब फ़िल्मी हो गया,
यह न ‘इरफ़ान’ को पता है,
न एन.एस.डी. को !!
‘सुतापा’ के इश्क़ नें उसे
क्या-क्या न बनाया !
कभी सेनापति भद्रसाल,
तो कभी,
रोहिल्ला सरदार नजीबुद्दौला !
कभी चन्द्रकान्ता का बद्रीनाथ
तो कभी सोमनाथ !
इसी इश्क़ में उसनें
‘सलाम बाम्बे’ कहा और फिर,
‘एक डॉक्टर की मौत’ के बाद,
‘वादे-इरादे’ के साथ,
सदा के लिए ‘सुतापा’ का हो गया।
‘बड़ा दिन’ आया !
लेकिन ‘घात’ लगाए बैठा था वक़्त,
‘क़सूर’ किसी का भी नहीं !
पर ‘गुनाह’ तो गुनाह है,
संघर्षों की ‘धुंध’ में,
‘फुटपाथ’ पर ‘मक़बूल’ की ‘सुपारी’ देकर
न जाने वक़्त नें,
क्या ‘हासिल’ कर लिया !
‘वक़्त की परछाई’ कौन देख पाया?
फिर भी,
‘चाकलेट’ सा लज़ीज़ ‘चेहरा’
‘साढ़े सात फेरे’ लेकर
न जाने कौन सा ‘रोग’ पाल बैठा !
अब ‘यूं होता तो क्या होता’ यह छोड़,
‘किलर’ नें ख़ुद डैडलाइन दी,
समय था ‘सिर्फ़ 24 घंटे’।
मोंटी की ‘लाइफ इन अ मेट्रो’
‘संडे’ के दिन ‘रोड टु लद्दाख’ पर आ गयी।
‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ का पुलिस इंस्पेक्टर,
‘न्यूयॉर्क’ तक ‘बिल्लू बारबर’ के नाम से,
विख्यात हो गया।
पर ‘पान सिंह तोमर’ का
‘एसिड फैक्ट्री’ में ‘नॉक आउट’
‘राइट या रॉन्ग’ का सवाल छोड़ गया।
जिसके ‘सात ख़ून माफ़’ थे,
उससे भी ‘ये साली ज़िन्दगी’
‘थैंक यू’ तक न कह सकी।
अपने ‘लंच बॉक्स’ से भी,
‘साहब, बीवी और गैंगस्टर’ के लिए,
कुछ नहीं निकाला, इसनें !
लेकिन, ‘हैदर’ के ‘किस्से’ के
इस ‘ज़ज़्बे’ को
एक ‘गुंडे’ की नज़र नें परखा।
वक़्त सबसे बड़ा ‘मदारी’ है !
नचाता है, हँसाता है, रुलाता है !
‘क़रीब-क़रीब सिंगल’ रहकर जो योगी
‘हिन्दी मीडियम’ के साथ शिखर तक पहुँचा,
उसके ‘कारवां’ को वक़्त नें
एक ‘पज़ल’ में उलझाकर,
दो साल तक ‘ब्लैकमेल’ किया !
और अन्ततः उसे
‘अंग्रेजी मीडियम’ तक पहुंचाकर
एक ही झटके में हमसे छीन लिया !
लाखों-करोड़ों आँखों को छलकाकर,
आज ख़ुद यह सितारा,
सितारों में विलीन हो गया।

.... अरविन्द सिंहानिया


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6 वर्ष पहले

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