उजाले से अंधेरों की तरफ जब जाता है मन
अकेला बेसहारा जब घबराता है मन
हालातों से लड़ते हुए जब कभी डगमगाता है मन
हंस हंस के आंसू जब छुपाता है मन
धोखे और फरेब से भरी शक़्ल के बाजर में
किसी ग़मगुसार को जब पाता है मन
अब्र के पिघलने के बाद अफताब सा होता है
जब ज़ार-ज़ार आंख बरसाता है मन
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