मर्टिन ने बनाया दिव्य यंत्र, मोबाइल जिसका नाम पड़ा,
सफल हुआ विज्ञान युग,
मानव मिलाप आसान हुआ ।।
धीरे-धीरे प्रगति हुई,
मोबाइल मन की चाह बन गयी ,
बच्चे बूढे युवा सबकी,
नींद चैन दिन रैन बन गई ,
रिश्ते- नाते उसी पे बनते,
फेसबुक ,इंस्टा ऐप आ गया,
दूरी घटी मिलों की लेकिन,
दिल में मिलों दूरी आ गयी ।।
इस यंत्र का देखो कमाल,
हल होते सारे सवाल,
जो काम होते थे घंटों के ,
सेकंड में हो जाते हैं,
ज़न क्या जाने इस जग में,
मोबाइल ही सर्वज्ञ हो गया ,
सात समुन्दर पार भी देखो ,
क्षण- भर का एक पंथ हो गया ।।
यह अभिशाप है या वरदान ,
यह हुआ नहीं है सर्वविदित,
करें अनुपयोगोपयोग हम,
यह स्वविवेक पर है आधृत ।।
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