आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज़िन्दगी

                
                                                         
                            ज़िन्दगी भी कैसे चलती है
                                                                 
                            
कभी भागती है कभी दौड़ती है ,
कभी बिखरती है, कभी संवरती है
कभी इशारों पर नचाती है, कभी अपनी धुन पर नाचती है ,
गिराती है ,उठाती है,उठा कर फिर गिराती है,
ये ज़िन्दगी भी कैसे चलती है,
कही मीठी फुहार है, कहीं दुखों की बयार है,
कही रोंधती है आशाओ को कभी जगाती है अभिलाषाओं को ,
कही प्रेम है कही क्रोध है,
कही हजारों का प्रतिशोध है
कही रुदाली है कही देवदासी है,
कही भरी है हुई है भावों से, कहीं लब्जो की प्यासी है,
कही मिलन का राग है कही विरह की उदासी है
ये ज़िन्दगी भी कैसे चलती है

अनुराग यादव अंशु

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर