चलो आओ आज उस चांदनी तक चले,
जहाँ तुझ में मैं था, मुझ मैं तुम थी,
न मैं मैं था, न तुम तुम थी
वो एक दोस्ती जो शुरुवाती लम्हे थे
कुछ अजनबी सी तुम थी कुछ अजनबी से हम थे
एक अनजानी सी मुस्कान लिए अधखुले लबों पर कुछ राज सिए
कुछ सकुचाई कुछ शरमाई कुछ कुछ राज लबों से खोले
कुछ घबराहट, कुछ बेचैनी कुछ ख़ामोशी छाई थी
वो राज नहीं बस एक लम्हा था उम भर तन्हाई थी
गठरी थी उन वादों की, उन यादो की उन बातो की
अपने रूठे रिश्ते टूटे ज़िन्दगी अब परछाई सी
चलो आओ फिर आज उस चांदनी तक चले
जहाँ रस्ते बदल जाते है, मंजिले बदल लेते है
बस अब तुम तुम थी और मैं मैं कहाँ था
अनुराग यादव अंशु ....
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