आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरे होने का सबसे सच्चा प्रमाण है।

                
                                                         
                            किसी ने पूछा मुझसे एक दिन—
                                                                 
                            
“तुम आखिर हो ही क्या?”
सुनकर
एक पल को सन्नाटा-सा छा गया…
फिर सोचा,
और खुद से ही सवाल किया—
आखिर मैं हूँ कौन?
दिमाग सोचता गया,
दिल बैठता गया,
उधेड़बुन चलती रही…
न ये तन मेरा है,
न ये मन मेरा है,
नाम भी किसी और ने दिया है,
तो फिर मेरी पहचान क्या है?
विचारों का मंथन चलता रहा,
मगर जवाब कहीं नहीं मिला।
सवाल पहाड़-सा सामने खड़ा रहा—
आखिर तुम क्या हो?
या मैं क्या हूँ?
फिर भीतर से एक आवाज़ आई—
“तू वो नहीं, जो दुनिया ने तुझे नाम दिया…
तू वो भी नहीं, जो आईने में दिखाई देता है।
तू तो वह है,
जो सब कुछ छूट जाने के बाद भी
तेरे भीतर शेष रह जाता है…”
और शायद—
खुद को पाने की यह तलाश ही
मेरे होने का सबसे सच्चा प्रमाण है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर