किसी ने पूछा मुझसे एक दिन—
“तुम आखिर हो ही क्या?”
सुनकर
एक पल को सन्नाटा-सा छा गया…
फिर सोचा,
और खुद से ही सवाल किया—
आखिर मैं हूँ कौन?
दिमाग सोचता गया,
दिल बैठता गया,
उधेड़बुन चलती रही…
न ये तन मेरा है,
न ये मन मेरा है,
नाम भी किसी और ने दिया है,
तो फिर मेरी पहचान क्या है?
विचारों का मंथन चलता रहा,
मगर जवाब कहीं नहीं मिला।
सवाल पहाड़-सा सामने खड़ा रहा—
आखिर तुम क्या हो?
या मैं क्या हूँ?
फिर भीतर से एक आवाज़ आई—
“तू वो नहीं, जो दुनिया ने तुझे नाम दिया…
तू वो भी नहीं, जो आईने में दिखाई देता है।
तू तो वह है,
जो सब कुछ छूट जाने के बाद भी
तेरे भीतर शेष रह जाता है…”
और शायद—
खुद को पाने की यह तलाश ही
मेरे होने का सबसे सच्चा प्रमाण है।
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