कू-ए-यार में मर जाने का था
मसला तो यार इक दीवाने का था
महफ़िल में मैंने बहुत शोर किया
मामला अपना दर्द दिखाने का था
तमाम रात वो मेरी पनाह में रहा
सुबह को उसको घर जाने का था
इक रात ने ही तो तबाह किया ‘सुब्रत’
वरना ज़िंदगी को यूँ ही गुज़र जाने का था
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