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वर्ष के अंत में

                
                                                         
                            साल पुराना छूट रहा है,
                                                                 
                            
लगता है जैसे कुछ टूट रहा है,
मेरी हर सांस, हर बात,
हर खुशी, हर गम का साथी ,
पल- पल मुझसे छूट रहा है|

मैं नहीं कहता कि इसने गम नहीं दिये
पर खुशी के पल भी कम नहीं दिये
तमाम झंझावात के बाद भी दिया रोशन है अपना
तो फिर कैसे कहूं इसने मरहम नहीं दिये|

अनजान के लिए मै ज्यादा खुश नहीं हो सकता
वर्तमान साथी से रुष्ट नहीं हो सकता
हमारा कर्म प्रतिफल ही मिला है हमें
प्रकृति के निर्णय से असंतुष्ट नहीं हो सकता|

फिर भी नव अतिथि के स्वागत में शुद्ध हो जाएं
अवगुण त्याग, स्वयं को जान, बुद्ध हो जाएं
कहीं ना फिर से प्रकृति सजा दे हमको
और हम बीतते वर्ष पर क्रुद्ध हो जाएं|
 
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4 वर्ष पहले

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