धीरे-धीरे भूल रहे, जीवन के सच्चे विचारों को।
माँ की ममता, पिता का साया, इन सबका उपकार,
आओ मिलकर फिर सँवारें, अपना सारा संसार।
प्रातः उठकर माता-पिता के चरणों में झुक जाते थे,
बड़ों के मीठे आशीषों से जीवन-पथ सजाते थे।
आज समय की भागदौड़ में भूल गए वह प्यार,
आओ फिर से लौटाएँ हम, अपना सच्चा व्यवहार।
दादी-नानी की बातों में ज्ञान भरा होता था,
उनकी मीठी लोरी सुनकर मन सुख से सोता था।
मोबाइल की चमक में खोए रिश्तों के संसार,
आओ फिर से जोड़ें मिलकर, टूटे हुए परिवार।
गुरु को पहले देव समझकर शीश झुकाया करते थे,
उनकी हर एक सीख को हम जीवन में धारा करते थे।
आज दिखावे की दुनिया में बढ़ता है व्यापार,
भूल रहे हम गुरुजनों का सच्चा उपकार।
कभी किताबें मित्र थीं अपनी, ज्ञान हमारा साथी था,
मेहनत ही पहचान हमारी, सपनों का आधार थी।
आज सफलता की दौड़ में छूट गया व्यवहार,
आओ फिर से सीखें मिलकर, श्रम, विनय और प्यार।
होली में सब भेद मिटाकर प्रेम-रंग बरसाते थे,
दीपावली में दीप जलाकर घर-आँगन चमकाते थे।
राखी की पावन डोरी में बँधता था परिवार,
त्योहारों के संग मिलता था रिश्तों को अधिकार।
अब त्योहारों की खुशियाँ भी तस्वीरों में आती हैं,
रीति-रिवाजों की बातें बस दिखावे में रह जाती हैं।
भूल गए हम पर्वों का वह सच्चा सत्कार,
आओ फिर से जीवित करें संस्कृति का संसार।
अपनी भाषा, अपनी बोली, अपनी सच्ची शान है,
माँ की भाषा हिंदी हम सबकी प्यारी पहचान है।
शब्द हमारे जोड़ें दिल से दिल का हर व्यवहार,
आओ मिलकर मान बढ़ाएँ हिंदी का संसार।
नई तकनीक अपनाएँ हम, ज्ञान नया भी पाएँ हम,
दुनिया के हर क्षेत्र में भारत का मान बढ़ाएँ हम।
लेकिन अपनी जड़ों को रखना सदा तैयार,
ऊँची उड़ान भले भरना, मत छोड़ो आधार।
संस्कार नहीं केवल पूजा, संस्कार नहीं दिखलावा,
सच्चाई के पथ पर चलना ही जीवन का दावा।
भूखे को भोजन दे देना, प्यासे को दे प्यार,
दुख में जो साथ खड़ा रहे, वही सच्चा संस्कार।
सत्य बोलना, दया करना, सेवा का व्रत धारण हो,
छोटे-बड़े सभी के प्रति मन में सदा सम्मान हो।
जाति-भेद की दीवारें तोड़ें, मिटाएँ हर विकार,
प्रेम, दया और सत्य से सुंदर हो संसार।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X