कोई शिकवा भी नहीं कोई शिकायत भी नहीं
दिल को तेरी थी जो पहले अब वो आदत भी नहीं
सारे ख़त जो थे तुम्हारे वो जला मैंने दिये
अब तो मेरे पास तेरी कोई अमानत भी नहीं
पहले ये दिल मेरा तेरे दीद को बेचैन था
कुछ दिनों से अब यहां दिल को ये हसरत भी नहीं
हां ये था आसान कि रोकर बहल जाएगा दिल
पर करें क्या कि हमें इसकी इजाज़त भी नहीं
एक तुम्हारे नाम का कलमा पढ़ा है मैंने जाँ
और अब इसके सिवा कोई इबादत भी नहीं।
-अनमोल
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