चाह रहा हूं मैं, सूरज सा उगूं
पर उगने के बाद कभी न डूबूं
चाह रहा हूं मैं,शहीदों को पूजूं
जलाऊं आशा के कुछ दीए
करूं कुछ अच्छा स्वदेश के लिए
मरूं तो मरूं मैं स्वदेश के लिए
बार बार जनमूं मैं स्वदेश के लिए।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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