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पर पढ़ने लिखने का नहीं,खेलने का मन करता है

                
                                                         
                            किताबें रखी हैं सामने
                                                                 
                            
कापियां रखी है सामने
पर पढ़ने लिखने का नहीं,खेलने का मन करता है
मन करता है घूमूं फिरुं खूब सोने का मन करता है
मन मेरा मतवाला, इधर उधर भटकता है
मन मेरा चोर, इधर उधर अटकता है
मन मेरा चुलबुला मोबाइल में भटकता है
आवारा है मन मेरा
आवारा है तन मेरा
कभी लक्ष्य पर नहीं टिकता है
मन मेरा कुछ नहीं सीखता है
कब तक खुद को ठगता रहूंगा?
कब तक देर रात जगता रहूंगा?
सोच सोच कर मन डरता है
मन मेरा फालतू काम करता है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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एक घंटा पहले

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