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बादल! कर मत मनमानी

                
                                                         
                            बादल! रे बादल! कर मत मनमानी
                                                                 
                            
तेरे बिना गरीब करें कैसे किसानी?
तेरा मन करता तो तू बरसता
तेरा मन करता तो तू गरजता
गरज गरज कर
डरा डरा कर
क्या करने को तुमने ठानी?
गरीबों के खेतों में नहीं पानी
रे रे पागल बादल! कर मत मनमानी
धनीकों के खेतों में तू बरसाता पानी
रे बादल! तू करता मनमानी
रे बादल! तू कर मत मनमानी
लिए तुम अमृत की धार
घूम रहा तू उधर,इधर तरस रहा संसार
गरीबों का आधार
है केवल तेरा पानी
जिसकी टूटी छानी
उस पर न कर मनमानी
रे तू सोच समझकर बरस
रे खा गरीबों पर तू तरस
बरस रे बादल! बरसा तू सोच संभल कर पानी।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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एक घंटा पहले

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