मैं अगर पौधे लगाऊंगा
फिर सिंच कर उन्हें पेड़ बनाऊंगा
बंजर धरती को हरा- भरा वन बनाऊंगा
फिर उन पेड़ों से मुझे प्यार होगा, लगाव होगा
पेड़ो को बचा ,मिट्टी को सजा जंगल बनाऊंगा
जंगल में रहने लगूंगा, मस्त- मलंग उनके फल फूल जड़ी खाऊंगा
ये जंगल ,ये जमीन मेरा सबकुछ हो जाएंगे
ऐसा करके तो प्रदूषण मिटाऊंगा
प्रकृति को मां बुलाऊंगा
फिर एक दिन सरकार को कोई सड़क बनाना होगा,कोई भवन बनाना होगा ,या सोना ,चांदी तांबा, कोई खजाना खुदाना होगा
फिर वो जंगल काटने लगेंगे
माटी को बांटने लगेंगे
मेरे जंगल ,मेरी जमीन ,मेरी प्रकृति, मेरी मां की आवाज उठाऊंगा
तब भी मैं सरकार की गोली से मारा जाऊंगा
अच्छा खासा आदमी मै नक्सली हो जाऊंगा
मैं तो पर्यावरण बचाकर भी मारा जाऊंगा
बचाने की जंग में, मै स्वयं मारा जाऊंगा
मारा जाएगा मेरा घर, मेरा परिवार
उजाड़ा जायेगा मेरा घर, द्वार,तमगा भी मिलेगा मुझे "गद्दार"
मैं इस तरह अपनी ही जंग में हारा जाऊंगा
मैं इस तरह से भी तो मारा जाऊंगा
फिर भी तुम सोचते हों कि मैं पेड़ लगाऊंगा
मरना ही है,तो मैं इन्हीं हालात में तैयार हूं
बस इतना सा है कहना मेरा
मैं भी देश भक्त हूं ,नहीं गद्दार हूं।
मैं बस जंगल में रहने वाला आदिवासी परिवार हूं।
-अंकित जैतवार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X