महक के मरती हो मेरे दामन से
गुजर के जार-जार होती हो
तुम मेरे लिए
मेरे हरेक कदमों की पहरेदार होती हो
मैं तुमसे दूर हूँ,
इस बात का मलाल है मुझे
मुझे यकीन है के मेरा ख्याल है तूझे
मैं अपने अंदाज में मरने गया
जीने लगा तूझे देखकर
तूझे हारना भी ख्वाब था
तूझे जीतने के बाद भी
मुझे गर्व है के ये तुम थी
तुम्हारे लिए ये नया नहीं है
तुम खिड़कियां खुली रखो
बंद होकर न चीखों मकान में
आवाज अनसुनी मिले
इतने तो हम बेगाने नहीं है
कुछ टूट चुका है घर में हमारे
हम कैसे न बोले जाना
कैसे राब्ता और कही हो
कैसे तन्हा तुमको छोड़े जाना
तुमने देखा है सिर्फ मकान को
तड़पे है हम घर के लिए जाना
--- अंकित उपाध्याय
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