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कुछ कहता है मौन

                
                                                         
                            कुछ कहता है मौन
                                                                 
                            

दिन की थकी हुई साँसों को
शाम ने अपनी गोद में भर लिया,
मन के भीतर जाने कितने
अनकहे मौसमों को स्वर दिया।

जो बातें कह न सकी ज़ुबाँ,
वे आँखों ने लिख दीं आज,
मौन किनारे बैठा मन
बुनता रहा कोई अनकहा राज।

डूब रहा था सूरज फिर भी,
आशा कहीं डूबी नहीं,
कुछ सपनों की कोमल लौ
मन के भीतर बुझी नहीं।

एक कलम चुपचाप पड़ी थी—
जैसे मुझसे कहती हो,
“जो मन में है, लिख डालो,
हर ख़ामोशी कुछ कहती है।”

मैंने भी फिर मन खोल दिया,
शब्दों को बहने दिया—
शायद लिखते-लिखते ही
खुद को थोड़ा समझ लिया।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
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एक घंटा पहले

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