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ख़त लिखता रहा

                
                                                         
                            ख़त लिखता रहा ~
                                                                 
                            

सारी रात दिल की बात लिखता रहा,
तेरे नाम अपनी रात लिखता रहा।

कमरे में जलता रहा रात भर चराग़,
उसकी लौ में बीते जज़्बात लिखता रहा।

जिसे कहना था, कह न सका सामने कभी,
उसी के नाम अपने जज़्बात लिखता रहा।

कई बार कलम रुक गई सफ़्हे के बीच,
फिर भी दिल की अधूरी बात लिखता रहा।

न कोई शिकवा किया, न कोई इल्ज़ाम लिखा,
बस रिश्तों की बची सौग़ात लिखता रहा।

वो दूर है—यह सच तो स्वीकार कर लिया,
फिर भी दिल में उसकी मुलाक़ात लिखता रहा।

हर बार ख़त को मोड़कर रख दिया मैंने,
फिर खोलकर वही पहली बात लिखता रहा।

न जाने ख़त कभी उसके हाथ पहुँचेगा या नहीं,
मैं फिर भी उसके नाम अपनी फ़रियाद लिखता रहा।

सहर हुई तो सफ़्हे भरे थे सामने,
मैं रात भर अपनी ही कायनात लिखता रहा।

‘अनिता’ कैसे भुला दूँ उस शख़्स को मैं,
वो दूर था, फिर भी उसकी याद लिखता रहा।

- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
47 मिनट पहले

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