फिर लौटना स्वीकार नहीं~
तुम्हारे जीवन में फिर से
लौटना नहीं स्वीकार मुझे,
बहुत सँजोया था तुमको कभी,
अब खोना नहीं स्वीकार मुझे।
तुम थे तो जीवन में
हर मौसम अपना लगता था,
तुम्हारी एक मुस्कान से
हर दुःख छोटा लगता था।
तुम्हारे साथ बिताए पल
आज भी साँसों में रहते हैं,
कुछ रिश्ते टूट जाने पर भी
दिल के भीतर जीवित रहते हैं।
तुम केवल प्रेम नहीं थे,
मेरी आदत, मेरी दुनिया थे,
मेरी हर छोटी-सी खुशी में
तुम ही तो सबसे पहले थे।
मगर प्रेम सिर्फ़ साथ नहीं,
विश्वास का नाम भी होता है,
जहाँ मन निश्चिंत होकर ठहरे,
वही सच्चा धाम भी होता है।
जिस दिन विश्वास दरका था,
कुछ भीतर भी टूट गया,
तुम पास रहे या दूर हुए,
एक रिश्ता उसी दिन छूट गया।
अब लौटकर मत पूछना
क्यों दरवाज़ा बंद मिला,
बहुत देर तक प्रतीक्षा की थी,
तब जाकर यह मन संभला।
मैंने तुम्हें भुलाया नहीं,
बस स्वयं को चुन लिया है,
जिस प्रेम में मैं मिटती रही,
उससे बाहर निकल लिया है।
तुम्हारे बिना जीना सीखा है,
अब फिर से बिखरना नहीं,
जो दर्द बहुत मुश्किल से सोया,
उसे फिर जगाना नहीं।
तुम्हारे जीवन में फिर से
लौटना नहीं स्वीकार मुझे,
प्रेम रहा है—रहेगा भी,
पर स्वयं को खोना नहीं स्वीकार मुझे।
कभी जो थे मेरे जीवन का
सबसे सुंदर अध्याय तुम,
अब उस किताब को बंद कर
चुपचाप आगे बढ़ना है मुझे।
नफ़रत नहीं है तुमसे कोई,
न मन में कोई शिकायत है,
बस अब तुम्हारे बिना भी
जीने की मुझमें आदत है।
तुम लौटो तो लौट आना
अपनी यादों के रास्ते,
मेरे जीवन में मगर अब
तुम्हारे लिए जगह नहीं है।
-अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
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