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बूँदें

                
                                                         
                            नभ के नील नयन से झरकर,
                                                                 
                            
कौन उतर आया आँगन में?
किसकी मौन व्यथा घुल आई
आज धरा के कण-कण में?

नहीं, इन्हें केवल बूँद न कहना—
इनमें कोई गीत छिपा है,
शून्य गगन की नीरवता में
किसने अपना मन लिख डाला है?

एक बूँद पलकों पर ठहरी,
जैसे कोई स्वप्न अधूरा,
एक धरा की गोद में सोई,
जैसे मिल गया उसे किनारा।

सूनी मिट्टी की प्यास बुझाकर
जब ये अधरों से लगती हैं,
तब लगता है—मौन दिशाएँ
मन की भाषा कहती हैं।

दूर क्षितिज पर मेघ घिरें तो
क्यों मन भी भर आता है?
किस अनदेखे प्रिय की स्मृति का
स्पर्श हृदय छू जाता है?

काली घटा के आँचल में
किसका विरह सिसकता होगा?
इन बूँदों के पार कहीं क्या
कोई दीपक जलता होगा?

कभी ये हँसतीं पत्तों पर,
कभी फूलों में खो जातीं,
कभी धूल भरे पथ पर गिरकर
चुपचाप कथा कह जातीं।

क्षण भर का अस्तित्व लिए ये
कितना गहरा अर्थ रचातीं—
मिटकर भी हरियाली बनकर
जीवन को नवगीत सुनातीं।

शायद जीवन भी बूँद यही है—
आना, बरसना, खो जाना;
पर जिस धरती को छू जाए,
उसमें अपना रंग उगा जाना।

फिर क्यों मृत्यु से भय खाएँ हम,
जब मिटना भी सृजन बने?
क्षण छोटा हो, किंतु हृदय में
अनंत प्रेम का स्पंदन बने।

नभ रोया या मन रोया था—
आज समझना कठिन हुआ;
बूँद-बूँद में कौन उतर आया,
मैं भी स्वयं से अपरिचित हुआ।

शायद कोई मौन पुकार थी,
शायद कोई स्मृति पुरानी—
बूँदों ने बस इतना जाना,
जीवन है क्षणभंगुर कहानी।

फिर भी हर क्षण को भर देना
स्नेह-सुधा की धार से;
बूँद बनो तो प्यास बुझाओ,
जीवन जियो उदार से।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’

 
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एक महीने पहले

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